ऐसा कोई कानून कहाँ है जो पुरुषों की झूठे मामलों से रक्षा करे ? : न्यायालय

Injustice

‘पुरुष के मान-सम्मान, गरिमा के विषय में कोई भी चर्चा नहीं करता, सभी महिलाओं के ही अधिकारों, मान-सम्मान, गरिमा के लिए लड़ रहे हैं । महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून बन रहे हैं लेकिन ऐसा कोई कानून कहाँ हैं जो पुरुष की ऐसी महिला से रक्षा करे जहाँ पर उसे झूठे मामले में फँसाया जा रहा है और प्रताड़ित किया जा रहा है ? इस मुद्दे पर निर्णय लेने का अब समय आ गया है ।’ यह बात दिल्ली की एक स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दुष्कर्म के एक झूठे मामले में आरोपी को बाइज्जत बरी करते हुए कही ।

इस मामले (युनिक केस आईडी नं. : ०२४०१R०४८२९७२०१५) में महिला ने आरोप लगाया था कि एक वकील द्वारा कई बार उससे बलात्कार किया गया था और किसीको बताने पर उसे व उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी गयी थी । बाद में अदालत में सच्चाई बताते हुए आरोप लगानेवाली महिला ने स्वयं कहा कि आरोपी पूरी तरह निर्दोष है और उसने गुस्से में आकर झूठी शिकायत दर्ज करा दी थी ।

मामले की सुनवाई कर रही अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश निवेदिता शर्मा ने कहा कि ‘आरोपी को उसका सम्मान व गरिमा वापस दिला पाना शायद सम्भव नहीं है और न ही बेइज्जती, क्लेश, यातना और आर्थिक हानि की कोई भरपाई हो सकती है ।’

” झूठी शिकायतें दर्ज करानेवाली महिलाओं को दंडित करना चाहिए ” : न्यायाधीश

एक अन्य झूठे दुष्कर्म मामले (युनिक केस आईडी नं. : ०२४०५ठ००३९२९२०१३) में एक महिला का इस्तेमाल अन्य शख्स ने मोहरे के तौर पर किया था । इस पर द्वारका कोर्ट (नई दिल्ली) के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्री वीरेन्द्र भट्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘यह सही है कि पीड़िता के लिए दुष्कर्म एक गहरी पीड़ा है लेकिन इस समस्या के दूसरे पहलू पर भी हमें गौर करना चाहिए । यह मामला एक आदर्श उदाहरण है कि किस प्रकार पुरुषों को दुष्कर्म के झूठे मामलों में फँसाकर लोग निजी विवादों को निपटाना चाहते हैं । यह मामला रेप-कानूनों के पूर्णरूप से दुरुपयोग का एक सटीक उदाहरण है । दुष्कर्म के झूठे मामले में फँसाये गये आरोपी पुरुष पर भी बिल्कुल उसी प्रकार की मानसिक पीड़ा, मानहानि एवं बदनामी का कहर टूट पड़ता है । जैसे ही समाज में किसी पुरुष के दुष्कर्म मामले में आरोपी होने की खबर फैलती है, सभी उसे हीन दृष्टि से देखने लग जाते हैं । तब उसके साथ उसके पूरे परिवार को ही एक तरह से समाज की मुख्य धारा से अलग कर दिया जाता है । उसका हर जगह अपमान होता है । न्यायालय द्वारा उसको बाइज्जत बरी किये जाने को भी लोग ध्यान नहीं देते तथा यह उसका खोया हुआ सम्मान और प्रतिष्ठा वापस पाने में भी कोई खास मदद नहीं करता । ऐसे ही दुष्कर्म के झूठे मामलों के कारण आज अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है ।

अब समय आ गया है कि न्यायालयों को उन महिलाओं के साथ सख्ती से व्यवहार करना चाहिए जो दुष्कर्म की झूठी शिकायतें दर्ज कराती हैं । ऐसी महिलाओं को, जो कि पीड़िता होने के बजाय उत्पीड़क साबित होती हैं, उन्हें कानून की उचित धाराओं के तहत दंडित करना चाहिए । चूँकि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि आरोप लगानेवाली महिला ने बलात्कार की झूठी शिकायत दर्ज करायी थी और आरोपी को बलात्कार के झूठे आरोपों के आधार पर सजा मिले यह सुनिश्चित करने के लिए इस न्यायालय के सामने झूठे सबूत भी पेश किये इसलिए आरोप लगानेवाली महिला भारतीय दंड अधिनियम १९३ के तहत कार्यवाही किये जाने योग्य है । यदि झूठे सबूत पेश करने के लिए आरोप लगानेवाली महिला के खिलाफ यथोचित कार्यवाही नहीं शुरू की गयी तो यह न्यायालय अपने कर्तव्य में चूक जायेगा । इसलिए अभियोक्त्री के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का आदेश कोर्ट रीडर को दिया जाता है ।’

रेप कानूनों, पॉक्सो एक्ट २०१२ व आपराधिक कानून (संशोधन) एक्ट २०१३ के दुरुपयोग में हो रही बढ़ोतरी की वजह से इनमें संशोधन की आवाजें उठने लगी हैं । विभिन्न न्यायाधीशों, वकीलों, न्यायविदों एवं मान्यवरों का भी मानना है कि रेप व यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों के दुरुपयोग को रोकने की सख्त आवश्यकता है । ऐसे कानून, जिनसे देश का सामाजिक ढाँचा, राष्ट्र की सामाजिक व्यवस्था तहस-नहस हो रही हो, उनमें संशोधन की दिशा में सरकार व न्यायपालिका शीघ्र कदम उठायेंगी ऐसी सबकी अपेक्षा है ।

One comment

  1. Very true!

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