देश, धर्म और संस्कृति का हर प्रेमी पीड़ित है

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श्री ब.रा. सिन्हा, सम्पादक

लक्ष्य छत्तीसगढ़’ मासिक समाचार पत्र

वरिष्ठ पत्रकार, जिला पत्रकार संघ राजनांदगाँव (छ.ग.)

अलमस्त फकीरी स्वभाव के संत आशारामजी बापू ढाई वर्ष से कष्टदायी जेल में हैं । इसके बावजूद उन्होंने समता का साथ नहीं छोड़ा है । ८-१० करोड़ साधकों का बल होने के बाद भी कभी उसका दुरुपयोग नहीं किया । हमेशा शांति का संदेश दे के शासन-प्रशासन को सहयोग दिया । जेल में रहकर भी हमेशा अपने भक्तों को समता, धीरज और अहिंसा का संदेश भेजते रहे । जहर उगलनेवाले टीवी चैनलों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया ।

बापू नहीं चाहते कि उनके प्यारे उनके लिए कष्ट सहें, कानून को हाथ में लेकर कोई भी गलत कदम उठायें । वे हमेशा कहते रहते हैं : ‘‘सबका मंगल, सबका भला हो ।’’ वे स्वयं कष्ट सहकर मुस्कराते हैं और अपने साधकों को कहते हैं :

‘‘मुस्कराकर गम का जहर जिनको पीना आ गया ।

यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया ।।’’

बापू हर परिस्थिति में सम रहने का जो उपदेश देते हैं, वह उनके स्वयं के जीवन में, व्यवहार में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है ।

आज हर वह व्यक्ति पीड़ित है, जिसे अपने देश, धर्म और संस्कृति तथा इनके रक्षक संतों से प्यार है । आज दुःखद बात यह है कि देश के इतने बड़े संत, जिन्होंने विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के बाद भारत का प्रतिनिधित्व किया और भारतीय संस्कृति की महानता का डंका बजाया तथा पूरे विश्व को प्रेम और भाईचारा सिखाया, उनको एक आधारहीन मुकदमे के चलते ढाई वर्ष से जेल में रखा गया है । इसे अन्याय की पराकाष्ठा नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ?

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